न वो महल अब दिखते हैं, न वो खेत अब दिखते हैं,
न महलों के वो ठाट रहे, न चलते हल अब दिखते हैं।
कहाँ वो महलों का सा इत्र, कहाँ मिट्टी की सोंधी महक,
न वो इंसानों में प्यार रहा, न साफ़ वो दिल अब दिखते हैं।
हर सम्त पसारा पैसों का, लालच की गहरी छाया है,
न बड़ों के लिए वो आदर है, न वो संस्कार अब दिखते हैं।
न महलों की वह शान रही, न गाँव का भोलापन बाकी,
डालों पर बैठी चिड़ियों के, चहकते मंज़र नहीं दिखते।
कहाँ वो छप्पन भोग रहे, कहाँ माटी के कुल्हड़ की छाछ,
खो गया वो पनघट का मेला, पनिहारिन के पग नहीं दिखते।
न तलवारों में वो तेवर हैं, न हँसिए की वो धार रही,
माटी पे जो मर मिटते थे, वो वीर सपूत नहीं दिखते।
राजकीय वो सन्नाटे हों, या गाँव का गहरा मातम हो,
दुख-दर्द में जो बँट जाते थे, वो अपने लोग नहीं दिखते।
काट दिए सब रिश्ते-नाते, नफ़रत की आग लगाई है,
दिलों में बसती उल्फ़त के, अब कोई निशां नहीं दिखते।
न महलों के वो हीरे-मोती, न गाँव की मीठी वो बातें,
क्या कहें कि ऐसा क्या बदला, जो ये एहसास नहीं दिखते?
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