माँ के लिए लिखी मेरी कविता में कुछ और यादें जोड़ी है जो आज फिर माँ के जाने का दर्द गहरा कर गया। यह दिल से निकला दर्द है और वो दर्द है, जो उसके दिल में अपने आप आ जाता है जिनकी माँ चली जाती है अपने बच्चे को अकेला छोड़ कर इस बेदर्द दुनिया में आज मुझे दुःख भी है और माँ पर गुस्सा भी ! कैसे जी पाउँगा तेरे बिना इस दुनिया से लड़ कर माँ...
तेरा जाना सीने में इक गहरा ज़ख्म दे गया,
ज़िंदगी का कोई तराना बनते-बनते रह गया।
अब पुकारूँ भी तो आवाज़ लौट आती है ख़ाली,
क्या तेरा अपना ही बेटा इतना बेगाना हो गया?
तू कहती थी सबसे प्यारा तुझको लाल तेरा,
क्या वो सारी बातें, वो सारा लाड़ फ़साना हो गया?
वादा था कि जिएँगे संग मेरी हर इक ख़ुशी के,
फिर बीच सफ़र में ही क्यों बेटा अकेला रह गया?
जिस महफ़ूज़ गोद में बीता था बचपन मेरा,
आज वो सिर्फ़ इक याद का लम्हा बनकर रह गया।
तेरे उस ठंडे, सुकून भरे आँचल का साया,
अब मेरी आँखों से बहते आंसुओं में छिप कर रह गया।
नज़रें तरसती हैं, पर तू कहीं नज़र नहीं आती,
न जाने बादलों में वो चाँद सा चेहरा कहाँ खो गया।
जिसके साए में कभी धूप का एहसास न हुआ,
सर से वो ममता की छाँव का आँचल छीन गया।
पिताजी की आँखों में अब ख़ामोश नमी रहती है,
छोटा भी हर कोने में बस गुमसुम सा हो गया।
हम तीन किनारों को जो जोड़ कर रखती थी,
हाय! वो ममता का मज़बूत बाँध आज टूट गया।
क्या ज़िन्दगी के ग़म इतने कम पड़ गए थे माँ,
जो बीच राह में ही तेरा मुकम्मल साथ छूट गया?
तू तो डरती थी हमेशा कि मौत कैसी होती है,
फिर इतनी ख़ामोशी से उसे ही दोस्त बना लिया?
अब क्या बची है ज़िंदगी माँ तेरे जाने के बाद,
तेरे साथ ही जीने का हर इक सबब ख़त्म हो गया।
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